Wednesday, November 20, 2019

जेएनयू के बहाने

गीतेश्वर

बात लगभग आठ साल पहले की है। मैं जमशेदपुर में हिन्दुस्तान के साकची स्थित कार्यालय में बैठा था कि एक होनहार बच्चा हाथ में आवेदन लेकर आया। चेहरे पर अधीरता के भाव थे। कपड़े भी निहायत साधारण। उस आवेदन में उसने मदद की बात लिखी थी। मुझे पहचानते देर नहीं लगी। कुछ दिन पहले ही उसकी तस्वीर सभी अखबारों में छपी थी। हमने अपने सहयोगी संजय कुमार (तत्कालीन शिक्षा रिपोर्टर) को बुलाकर पूछा तो उसने बताया कि हां, यह वही बच्चा है… झारखंड बोर्ड में दसवीं का टापर।
बी और सी ग्रेड शहरों की बात करें तो जमशेदपुर स्कूलिंग के मामले में झारखंड ही नहीं, देश में पहला स्थान रखता है। वहां के अच्छे स्कूलों में शुमार (परसेप्शन के अनुसार टाप-3 में नहीं) डीएवी में वह बच्चा एडमिशन चाहता था मगर उसके पास फीस भरने के पैसे नहीं थे। मैंने अपने अखबार के तत्कालीन सिटी चीफ देवेंद्र जी को बुलाया और तय किया कि इसकी मदद हर हाल में करनी है। पहला खयाल तो यही आया कि तुरंत अपने पास से इसकी फीस भरकर एडमिशन करा दिया जाए, जो कई बार हमने किया भी है, मगर एक पत्रकार के नाते उनलोगों को आईना दिखाना भी चाहते थे, जो बोर्ड रिजल्ट के बाद उसको बधाई देने के नाम पर अखबारों में नाम-फोटो छपवाये थे। उन सभी माननीयों से एक-एक कर हमने बात की और खबरों की एक सीरिज की शुरुआत हो गई।
फिर क्या था… तमाम लोग मदद के लिए आगे आए। इनमें से भी एक मदद करने वाले को मैं ताउम्र नहीं भूल पाऊंगा। आदित्यपुर में किसी कंपनी का सुरक्षा गार्ड था और करीब डेढ़ हजार रुपये कैश लेकर मेरे पास पहुंचा था एडमिशन में उस बच्चे की मदद करने। मैंने उससे कहा कि तुम रहने दो या फिर कैश बच्चे के बैंक खाते में जमा करा सकते हो तो कहने लगा कि हम कहां जाएंगे.. आप लेकर दे दीजिएगा। मैंने उसे समझा बुझाकर पैसे सहित वापस भेजा कि एडमिशन की व्यवस्था हो गई है। एक सप्ताह के अंदर उस प्रिंसिपल को अपनी गलती का एहसास हो चुका था और बुलाकर बच्चे का एडमिशन ले लिया। बाद में मेरा तबादला धनबाद हो गया। मैंने एक दिन उस बच्चे की खोज-खबर लेनी चाही तो पता चला कि अब वह आईआईटी मद्रास से बी-टेक कर चुका है। आत्मिक खुशी हुई। देवेंद्र जी ने बताया कि वह मुझे याद करता है। खैर, धन्यवाद हिन्दुस्तान का और जमशेदपुर का, जिसके कारण एक अच्छा काम करने का मौका मिला। मैंने उस बच्चे का नाम जानबूझकर नहीं लिखा। संभवत: किसी कंपनी में वह कार्यरत हो और पता नहीं उस बात को याद करना चाहेगा या नहीं। लेकिन उस समय मैंने उसके पटमदा स्थित घर पर एक टीम भेजी थी तो उस टीम के अनुसार उसकी मां ईंटें ढोने का काम करती थी और पिता ईंटों को जोड़ने का। लोग रेज-कुली के नाम से उन्हें जानते थे। जिस दिन 10वीं का रिजल्ट आया, उस दिन भी दोनों पति-पत्नी कहीं मजदूरी कर रहे थे।
आज अनायास ये बातें याद आ गईं तो इसका कारण भी है। दरअसल, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रकरण पर सोशल मीडिया पर जो कुछ देख-पढ़ रहा हूं और आंदोलित छात्रों को गाली देते कुछ लोगों के बारे में सोचता हूं तो अत्याधिक ग्लानी होती है। इन्हें पता ही नहीं कि गरीब छात्र चंद रुपयों के लिए कैसे बड़े से बड़े अवसर गंवा देते हैं। मैं कुछ ऐसे लोगों को भी जानता हूं जिन्होंने अत्याधिक गरीबी से जूझकर अच्छा मुकाम हासिल किया, लेकिन उनको पीछे मुड़कर देखने में डर लगता है। आश्चर्य है कि कुछ ऐसे लोग अपना बीता समय भूलकर कीचड़ उछालने का खेल खेल रहे हैं।  जेएनयू देश की शान है। देश के सर्वाधिक गरीब और प्रतिभाशाली बच्चे को भी हक है कि इसमें पढ़ने का ख्वाब देखे। इसलिए कहने की जरूरत नहीं कि उनकी मांगों से एकदम असहमत नहीं हुआ जा सकता। संवेदनशीलता का तो यही तकाजा है।