Monday, June 25, 2018

पूर्णिया के रेणु और रेणु का पूर्णिया



बिहार की कला संस्कृति की धरती रही है पूर्णिया। इस माटी ने देश को महान लेखक से लेकर रणबांकुरे तक दिए हैं, जिनकी भारत के निर्माण में सकारात्मक भूमिका रही है। स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत 1917 में चंपारण में नील की खेती के खिलाफ की गई तो इसकी अगली चिंगारी पूर्णिया में ही फूटी और देखते ही देखते यहां के नौजवान आजादी में अपनी आहुति देने के लिए तैयार हो गए। 1942 तक आजादी का यह जुनून यहां के कण-कण में फैल चुका था। जेपी आंदोलन में भी इसने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। एक तरफ आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक प्रवाह का मिलन स्थल रहा है पूर्णिया जिला तो दूसरी तरफ समय, संवेदना और सरोकार की त्रिवेणी भी। यह शहर गरीबी और अभाव से जूझना और उबरना जानता है।
यह अपनी संपूर्णता में सहज है। बिहार का प्रतिनिधि शहर होने के नाते इसका अलग महत्व है। फणीश्वरनाथ रेणु कहा करते थे कि पटना और पूर्णिया मेरे लिए प के अनुप्रास हैं और इससे मैं पूजा भाव से जुड़ा हूं। कमलेश्वर के शब्दों में यह राज्य और देश का आगामी अतीत है, जो हमारे वर्तमान को संरक्षित करने के साथ भविष्य का दिशा निर्देश करता है। यानी सपना और यथार्थ का संतुलन बिंदु है। यह क्षेत्र रूढ़ियों को तोड़ने और हमेशा नवीन सिद्धांतों की स्थापना के लिए भी जाना जाता है। यानी प्रगतिशीलता का पक्षधर है। सुप्रसिद्ध आचार्य मंडन मिश्र को आदि शंकराचार्य ने जहां पराजित किया था और अद्वैत वेदान्त की नींव मजबूत की थी, शास्त्रार्थ की वह जगह पूर्णिया से मात्र लगभग 100 किमी की दूरी पर है। यानी यही वह क्षेत्र था जहां शंकराचार्य को सबसे कठिन चुनौती मिली थी।   
कुछ वर्ष पहले तक यहां सेमल के फूल से भरे बसंत सा दृश्य होता था। फूलों और पक्षियों की जितनी प्रजातियां यहां हैं, और कहीं नहीं। अपने मुद्दे पर आने से पहले हम पूर्णियां के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि अविभाजित पूर्णियां के किशनगंज अनुमंडल में महाभारतकालीन अवशेष और बनमनखी में भगवान नरसिंह का स्तंभ है, जिससे इसके इतिहास की प्राचीनता का बोध होता है। इतिहास गवाह है कि पूर्णिया क्षेत्र हमेशा से सदभाव और संवेदना का धनी रहा है। यहां अंगिका, मैथिली, संताली, बंगला, उर्दू, राजस्थानी आदि बोलने वाले लोग हैं।
फूलों की बात करें तो इसे फ्लावर आफ द सिटी भी कहते हैं, जहां हमारे विरासत की खूशबू रची गई। रेणु जैसे लेखक और मैला आंचल जैसी रचना सदियों में मुश्किल से एक बार होती है। रेणु के उपन्यास मारे गये गुलफाम पर बनी फिल्म तीसरी कसम के बिना हिन्दी फिल्म का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। इन रचनाओं की प्रेरणा पूर्णिया ही है।
एक ऐसे समय में जब हमारा समाज बंटा हुआ प्रतीत होता है, तो पूर्णिया जैसी भूमि देवभूमि हो जाती है, जहां किसी प्रह्लाद को बचाने और हिरण्यकशिपु को मारने के लिए स्वयम श्रीहरि को इसी धरती पर ही अवतार लेना पड़ता है।
तत्कालीन जिला प्रशसन के प्रयास और यहां के लेखकों, शिक्षकों और इतिहासकारों के सहयोग से पुरैनिया के रूप में एक बृहद हैंडबुक तैयार किया गया है। इसमें इसके हर पहलू को समाहित करने का प्रयास है। ऐसा प्रयास हर जिला में हो तो हमें अपनी संस्कृति, सभ्यता और मौलिक इतिहास को सहजने में मदद मिलेगी, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणश्रोत बनेगी। निश्चित रूप से इस धरती का ही कमाल है वर्ना किसी और जिले यह इतना सफल आयोजन क्यों नहीं किया गया? इसी पुस्तक में एक जगह कथाकार विभूति भूषण बन्दोपाध्याय के आंखों देखा सौंदर्य वर्णन के साथ मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं, जिसमें उन्होंने कहा था कि- ऐसा निर्जन, अंतहीन, उन्मुक्त, विशाल अरण्य भूमि, पर्वतमाला, वनप्रांत और काश से परिपूर्ण शांत स्तब्ध देश अपनी आंखों से न देखा होता तो कभी विश्वास ही नहीं होता कि बंगाल के निकट की एक ऐसी जगह, जो सौंदर्य में एरिजोना के पथरीले मरूदेश या रोडेशिया के बुशभेल्ड से कम नहीं...।