Friday, July 20, 2018

बेसुरे समय को सुरीला बना गए नीरज



कुछ लोग अपने जीवनकाल में ही मिथ बन जाते हैं। गीतकार गोपालदास नीरज भी ऐसे ही जीवित किंवदंती थे। हरिवंश राय बच्चन के बाद वे दूसरे सबसे बड़े जनकवि माने गए, जिन्होंने कविता को किताबों और कुछ विद्वानों के बीच की चर्चा से निकालकर आम लोगों में लोकप्रिय बनाया। वे अपनी रचनाओं से माध्यम से सीधे संवाद करते थे और अभिव्यक्ति के रास्ते में आने वाले शिल्प को तोड़ने से भी गुरेज नहीं करते थे। हालांकि उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी और इस कारण उनकी चर्चा केवल फिल्मी गीतों और मंचीय कवि के रूप में होती रही। बड़े और गंभीर माने जाने वाले समीक्षक उनपर लिखने से बचते रहे और अभी भी उनपर बात करने में कंजूसी बरतते हैं। मैं बड़ी इमानदारी से कह कह सकता हूं कि इस महान गीतकार का सही मूल्यांकण आने वाला समय ही करेगा।

दरअसल, शिल्पप्रेमी नीरज के लिए कथ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण था। इसी कारण जरूरत पड़ने पर वह नया शिल्प गढ़ने और उसे तोड़ने से भी नहीं चूकते थे। नीरज को समझने के लिए उस दौर में जाना होगा, जहां देश में हरिवंश राय बच्चन की आंधी चल रही थी और किसी भी कवि के लिए वहां टिकना मुश्किल था। नीरज ने चुनौती स्वीकार की और एक समानांतर धारा बहाने में कामयाब हुए, ठीक उसी तरह जैसे महानायक की उपाधि पा चुके अमिताभ बच्चन जब बड़े पर्दे पर आए तो राजेश खन्ना के सामने किसी का टिकना मुश्किल माना जा रहा था, मगर अमिताभ ने अपनी जगह बना ली।
यह तो जनवादी लेखक भी मानते हैं कि नीरज केवल मंचीय, गाने वाले या गाये जाने वाले कवि नहीं थे, मगर दबी जुबान से। उनकी रचनाओं में दार्शनिकता, सोच की विविधता, जीवन के प्रति जबरदस्त अनुराग है। इसके साथ ही समय के साथ संवाद करते रहे नीरज।
  कई साल पहले की बात है। भीमताल से झारखंड लौटते समय दिल्ली में कई घंटे इंतजार करना था। इच्छा हुई क्यों न इस समय का सदुपयोग करते हुए नीरज से मुलाकात कर ली जाए। इच्छा को मैं चाहकर भी दबा नहीं पाया और अलीगढ़ उनसे मिलने चल पड़ा। लगभग साढ़े तीन घंटे के सफर के बाद जब पहुंचा तो यह देखकर दुख हुआ कि नीरज जी का स्वास्थ्य एक साल में ही काफी गिर गया था। मगर यह नीरज के ही बस की बात थी कि कविताओं पर चर्चा शुरू होते ही उनके अंदर जाने कहां से इतनी ऊर्जा और ताजगी आ गई कि घंटों बीत गए, पता ही नहीं चला।
  बात चाहे धर्म-अध्यात्म की हो या फिर राजनीति की, समय उनकी रचनाओं में चीख-चीख कर बोलता है और उन्हें सिर्फ श्रृंगारिक कहने और मानने वालों को बताता है कि सच को कुछ देर के लिए दबाया जा सकता है मगर झुठलाया नहीं जा सकता।
काले धन के खिलाफ जब देश भर में आंदोलन की आंधी चल रही थी तो उस पर नीरज की दो-टूक राय थी। उस समय दिल्ली में अन्ना हजारे का सबसे प्रभावी आंदोलन हुआ था और उसके बाद बाबा रामदेव का जलवा दुनिया ने देखा था, जिसमें उनको महिला के कपड़े पहनकर भागना पड़ा था।  मैंने नीरज जी से पूछा, बाबा रामदेव ने क्या गलती की और अन्ना हजारे को इतना समर्थन कैसे मिला? और क्या इससे देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? अपनी राय वे इन पंक्तियों में व्यक्त किए -
इंसान की ख्वाहिश का कोई अंत नहीं,
है कौन जो इच्छाओं से उद्भ्रंत नहीं।
जो योग सिखाते हुए व्यापार करे,
वो और भले कुछ हो मगर संत नहीं।
उन्होंने कहा कि अन्ना ने जागृति कर दी लेकिन कानून से ही भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। उन्होंने दो लाइनें सुनाईं -
भ्रष्ट जहां नेतृत्व हो, भ्रष्ट जहां सरकार
खत्म वहां फिर हो भला, कैसे भ्रष्टाचार
नीरज ने चीन से युद्ध, पाक से युद्ध, आपातकाल, ग्रामीण परिवेश और दबे कुचले लोगों पर खूब लिखा। बावजूद इसके वे हमेशा श्रंृगारिक कविताओं से ही चर्चा में रहे। कम शराब पीकर भी उनकी चर्चा अधिक हुई तो इसके लिए वे खुद भी जिम्मेदार थे। फिराक की तरह अपने प्रति अफवाहों को उन्होंने खुद हवा दी।
दरअसल, सच कहूं तो नीरज को शराब से अधिक गीतों का नशा था। प्रेम ही उनकी मदिरा थी। शाम को नीरज के साथ प्याला टकराने और सुबह उनकी आलोचना करने वालों की कमी नहीं रही मगर यह भी उतना ही सत्य है कि साथ में प्याला टकरा लेने से कोई नीरज नहीं बन गया या उनकी आलोचना का अधिकार नहीं पा गया। ऐसे लोगों ने केवल स्थूल अर्थों में ही उन्हें देखा। प्रेम की गहनता, पागलपन, बेचैनी और न जाने कितनी स्वप्नविहीन काली रातें नीरज ने देखी थीं और अपनी रूह का दीया जला कर हिन्ही साहित्य में उजाला फैलाया। इसलिए उन्हें कदापि कम करके नहीं आंका जा सकता।
नीरज से मैं दर्जनों बार मिला था, उन्हें बड़े आयोजनों में सुना भी। उन्हें मैंने जितना समझा उसके अनुसार मुझे हर बार एक नए नीरज से मुलाकात हुई। जिसका धर्म में नहीं, बल्कि धार्मिकता में जिसका विश्वास था। जो धर्म को अनुभूति और संसार को आडंबर मानता रहा। आदर्श में नहीं, बल्कि व्यावहारिका में विश्वास रखता था। बिल्कुल एक मस्त फकीर की तरह, जिनका जीवन एक खुली किताब थी, जिसका एक-एक पन्ना, एक-एक पंक्ति और एक-एक शब्द आसानी से पढ़ा देखा, सुना और समझा जा सकता था। जिन्होंने जीते-जी मृत्यु गीत लिखकर सदी के महान कवि होने का बोध कराया। जिन्होंने उस दौर में मुुंबई की फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया जब उनके गीतों की पूरे देश में धूम मची हुई थी। आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं और ये भाई जरा देख के चलो जैसे गीतों से धूम मचाने वाले और आधी सदी से अधिक समय तक कवि सम्मेलनों के राजकुमार बनकर अपनी मदहोश आवाज से सबको मुग्ध कर देने वाले नीरज का लिखा गीत - ये प्यासों की प्रेम सभा है- ओशो की प्रार्थना सभा में गाया जाता था, शायद उनके भक्त आज भी गाते हों। नीरज खुद मानते थे कि वे रजनीश (ओशो) से वे प्रभावित थे और ओशो भी उनके प्रशंसक थे।
नीरज से मुलाकात में गीत, गणित और गीता की बातों का काकटेल वाकई उनके सम्मोहन को बढ़ाता था। नीरज बीच-बीच में कुछ पंक्तियां सुनाते थे तो लगता था अपनी आत्मकथा सुना रहे हों -
मुझसे लिपटी कई कथाएं
मेरी होती हैं चर्चाएं
मुझे ओढ़ाओ शब्द नहीं
मैं पूर्ण दिगंबर हूं
जिस सादगी से वह कह गए कि बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं, उसमें तनिक भी बनावट की बू नहीं आती। नीरज ने विभिन्न फिल्मों में सवा सौ से अधिक गाने लिखे, जिनमें से सौ से अधिक सुपरहिट हुए। गीत, दोहे और कविताओं के अलावा उन्होंने कई गद्य की पुस्तकें भी लिखीं। साथ ही कई किताबों का संपादन किया। पिछले वर्षों में उन्होंने जापानी कविता विधा हाईकू पर भी काफी कुछ लिखा पढ़ा। एक बार मैंने पूछा था कि इस विदेशी विधा की उन्हें जरूरत क्यों आन पड़ी, तो इसका उत्तर उन्होंने दिया था कि बड़ी रचनाएं पढ़ने का समय अब किसके पास है। जितने कम शब्दों में बात हो जाए, वही बेहतर। यानी टेस्ट मैच के दौर में ट्वंटी-ट्वंटी के महत्व को नीरज ने पहचानने में देरी नहीं की।
आज के समय को सही अर्थों में जानना है तो नीरज का समग्र मूल्यांकन करना होगा। समकालीन कविता के नाम पर कुछ रचनात्मक कुंठाओं को प्रोत्साहित करने में भी कोई परेशानी नहीं है। मगर खांचे, मठों और गढ़ों से निकलकर बात करें तो यह समझना ही होगा कि गीतों इस अथक योद्धा ने कैसे एक बेसुरे समय को सुरीला बनाया।

- गीतेश्वर




Monday, June 25, 2018

पूर्णिया के रेणु और रेणु का पूर्णिया



बिहार की कला संस्कृति की धरती रही है पूर्णिया। इस माटी ने देश को महान लेखक से लेकर रणबांकुरे तक दिए हैं, जिनकी भारत के निर्माण में सकारात्मक भूमिका रही है। स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत 1917 में चंपारण में नील की खेती के खिलाफ की गई तो इसकी अगली चिंगारी पूर्णिया में ही फूटी और देखते ही देखते यहां के नौजवान आजादी में अपनी आहुति देने के लिए तैयार हो गए। 1942 तक आजादी का यह जुनून यहां के कण-कण में फैल चुका था। जेपी आंदोलन में भी इसने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। एक तरफ आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक प्रवाह का मिलन स्थल रहा है पूर्णिया जिला तो दूसरी तरफ समय, संवेदना और सरोकार की त्रिवेणी भी। यह शहर गरीबी और अभाव से जूझना और उबरना जानता है।
यह अपनी संपूर्णता में सहज है। बिहार का प्रतिनिधि शहर होने के नाते इसका अलग महत्व है। फणीश्वरनाथ रेणु कहा करते थे कि पटना और पूर्णिया मेरे लिए प के अनुप्रास हैं और इससे मैं पूजा भाव से जुड़ा हूं। कमलेश्वर के शब्दों में यह राज्य और देश का आगामी अतीत है, जो हमारे वर्तमान को संरक्षित करने के साथ भविष्य का दिशा निर्देश करता है। यानी सपना और यथार्थ का संतुलन बिंदु है। यह क्षेत्र रूढ़ियों को तोड़ने और हमेशा नवीन सिद्धांतों की स्थापना के लिए भी जाना जाता है। यानी प्रगतिशीलता का पक्षधर है। सुप्रसिद्ध आचार्य मंडन मिश्र को आदि शंकराचार्य ने जहां पराजित किया था और अद्वैत वेदान्त की नींव मजबूत की थी, शास्त्रार्थ की वह जगह पूर्णिया से मात्र लगभग 100 किमी की दूरी पर है। यानी यही वह क्षेत्र था जहां शंकराचार्य को सबसे कठिन चुनौती मिली थी।   
कुछ वर्ष पहले तक यहां सेमल के फूल से भरे बसंत सा दृश्य होता था। फूलों और पक्षियों की जितनी प्रजातियां यहां हैं, और कहीं नहीं। अपने मुद्दे पर आने से पहले हम पूर्णियां के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि अविभाजित पूर्णियां के किशनगंज अनुमंडल में महाभारतकालीन अवशेष और बनमनखी में भगवान नरसिंह का स्तंभ है, जिससे इसके इतिहास की प्राचीनता का बोध होता है। इतिहास गवाह है कि पूर्णिया क्षेत्र हमेशा से सदभाव और संवेदना का धनी रहा है। यहां अंगिका, मैथिली, संताली, बंगला, उर्दू, राजस्थानी आदि बोलने वाले लोग हैं।
फूलों की बात करें तो इसे फ्लावर आफ द सिटी भी कहते हैं, जहां हमारे विरासत की खूशबू रची गई। रेणु जैसे लेखक और मैला आंचल जैसी रचना सदियों में मुश्किल से एक बार होती है। रेणु के उपन्यास मारे गये गुलफाम पर बनी फिल्म तीसरी कसम के बिना हिन्दी फिल्म का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। इन रचनाओं की प्रेरणा पूर्णिया ही है।
एक ऐसे समय में जब हमारा समाज बंटा हुआ प्रतीत होता है, तो पूर्णिया जैसी भूमि देवभूमि हो जाती है, जहां किसी प्रह्लाद को बचाने और हिरण्यकशिपु को मारने के लिए स्वयम श्रीहरि को इसी धरती पर ही अवतार लेना पड़ता है।
तत्कालीन जिला प्रशसन के प्रयास और यहां के लेखकों, शिक्षकों और इतिहासकारों के सहयोग से पुरैनिया के रूप में एक बृहद हैंडबुक तैयार किया गया है। इसमें इसके हर पहलू को समाहित करने का प्रयास है। ऐसा प्रयास हर जिला में हो तो हमें अपनी संस्कृति, सभ्यता और मौलिक इतिहास को सहजने में मदद मिलेगी, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणश्रोत बनेगी। निश्चित रूप से इस धरती का ही कमाल है वर्ना किसी और जिले यह इतना सफल आयोजन क्यों नहीं किया गया? इसी पुस्तक में एक जगह कथाकार विभूति भूषण बन्दोपाध्याय के आंखों देखा सौंदर्य वर्णन के साथ मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं, जिसमें उन्होंने कहा था कि- ऐसा निर्जन, अंतहीन, उन्मुक्त, विशाल अरण्य भूमि, पर्वतमाला, वनप्रांत और काश से परिपूर्ण शांत स्तब्ध देश अपनी आंखों से न देखा होता तो कभी विश्वास ही नहीं होता कि बंगाल के निकट की एक ऐसी जगह, जो सौंदर्य में एरिजोना के पथरीले मरूदेश या रोडेशिया के बुशभेल्ड से कम नहीं...।